Organic Mustard Farming
सरसों की जैविक खेती का परिचय:-
भारत में सरसों रबी मौसम की एक प्रमुख तिलहन फसल है, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे- राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। यह न सिर्फ हमारे भोजन का अहम हिस्सा है बल्कि किसानों के लिए एक प्रमुख नकदी फसल भी है। आज जब लोगों की रुचि शुद्ध और रासायनिक रहित उत्पादों की ओर बढ़ रही है, तब जैविक सरसों की खेती एक श्रेष्ठ विकल्प बन चुकी है। जैविक खेती में रासायनिक खाद या कीटनाशकों के बजाय प्रकृति आधारित संसाधनों का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, बल्कि सरसों तेल की गुणवत्ता भी अधिक शुद्ध होती है।
और पर्यावरण-संरक्षक विकल्प बनकर उभरी है। इसका उपयोग करना मतलब स्वास्थ्य जीवन जीने का एक वरदान सबित हो सकता है। चलिए इस फसल की पूर्ण जानकारी के लिए आगे बढ़ते हैं।
किसान भाइयों इस ब्लॉग में जानिए सरसों की जैविक खेती करने की पूरी प्रक्रिया - बीज का चयन, भूमि की तैयारी, जैविक खाद, रोग नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने के उपाय। यह लेख किसानों के लिए 2025 में सरसों की जैविक खेती से अधिक मुनाफा कमाने की पूरी जानकारी देता है।
सरसों की जैविक खेती क्या है?
जैविक खेती का अर्थ है - रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंथेटिक रसायनों के बिना खेती करना। इसमें “गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली, हरी खाद” और प्राकृतिक कीटनाशक जैसे “नीम तेल, छाछ घोल, गोमूत्र आधारित द्रव” का उपयोग किया जाता है।
सरसों की जैविक खेती में मिट्टी की सेहत बनी रहती है, फसल में शुद्धता रहती है और तेल की गुणवत्ता भी बढ़ती है।
जलवायु:
सरसों ठंडी और शुष्क जलवायु की फसल है। 10°C से 25°C तापमान इसके लिए आदर्श है।
बहुत अधिक ठंड या अधिक गर्मी इसके फूल और दानों पर विपरीत असर डालती है फूलों व फलों में संक्रमण का खतरा अधिक बढ़ जाता है।
मिट्टी का प्रकार:
- दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है।
- मिट्टी का pH स्तर 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
- जल निकासी अच्छी होनी चाहिए ताकि जलभराव न हो।
भूमि को अच्छी तरह जोतें और बारीक भुरभुरी बना लें।
पहली जुताई “गहरे हल” से करें और दूसरी जुताई “रोटावेटर या देशी हल” से करनी चाहिए।
इसके बाद खेत में “गोबर की सड़ी हुई खाद (20-25 टन प्रति हेक्टेयर)” डालें। इसे आसान इकाई में समझिए (5 से 6 टन/प्रति बीघा (20 बिस्वा/कट्ठा))।
अगर संभव हो तो “हरी खाद (सनई या ढैंचा)” का उपयोग करें, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है।
1. बीज का चयन:
जैविक खेती के लिए स्थानीय और रोग प्रतिरोधक किस्में उपयुक्त रहती हैं जैसे-
- पुसा बोल्ड
- वरुणा
- रॉयल गोल्ड
- आरजीएन-48
- पायनियर सरसों-45S46 (हायब्रिड किस्म) है इसकी पैदावार 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
रासायनिक बीज उपचार के बजाय, “ट्राइकोडर्मा विरिडे (4 ग्राम/किलो बीज)” या “नीम तेल” से उपचार करें।
इससे बीज जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है।
उत्तरी भारत में “1 अक्टूबर से लेकर 15 नवंबर” तक बुवाई का सही समय है।
बहुत जल्दी या देर से बुवाई करने पर उपज प्रभावित हो सकती है।
- कतार से कतार की दूरी: 30 से 45 सेमी
- पौधे से पौधे की दूरी: 10 से 15 सेमी
- बुवाई की गहराई: 3 से 4 सेमी
- बीज की मात्रा: 8 से 10 किग्रा प्रति हेक्टेयर
सरसों की फसल को कम पानी की आवश्यकता होती है, परंतु उचित समय पर सिंचाई बहुत जरूरी है।
- अंकुरण के बाद 20-25 दिन पर पहली सिंचाई
- फूल आने के समय दूसरी सिंचाई
- दाने भरने के समय तीसरी सिंचाई कर सकते हैं।
- गोबर की खाद - 20-25 टन/हेक्टेयर
- वर्मी कम्पोस्ट - 4-5 टन/हेक्टेयर
- नीम खली - 200 किग्रा/हेक्टेयर
- जीवामृत या घनजीवामृत का - हर 15 दिन में छिड़काव करें
जीवामृत एक तरल जैविक खाद है जिसे गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी को पानी में मिलाकर बनाया जाता है। वहीं, घनजीवामृत उसी मिश्रण का सूखा या ठोस रूप है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए जैविक पोटाश और फॉस्फेट सॉल्यूशन का उपयोग किया जा सकता है।
(1) सफेद जंग / व्हाइट रस्ट:
- रोकथाम - नीम तेल (10%) या छाछ के घोल का छिड़काव करें।
- नीम का अर्क 5% या लहसुन + मिर्च + अदरक के घोल का छिड़काव करें ।
- गोमूत्र और छाछ (1:10 अनुपात में) घोलकर छिड़काव करें।
ब्रह्मास्त्र एक जैविक कीटनाशक है जो गौमूत्र और विभिन्न पेड़-पौधों की पत्तियों, जैसे नीम, सीताफल, पपीता और धतूरा, को मिलाकर बनाया जाता है। यह फसल को कीटों से बचाने में मदद करता है, खास तौर पर रस चूसने वाले कीड़ों और बड़े कीटों को। यह सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है जो फसलों को नुकसान से बचाता है और मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार करता है।
पहली गुड़ाई बुवाई के 20-25 दिन बाद और दूसरी 40-45 दिन बाद करें।
जैविक खेती में "मल्चिंग" और "फसल चक्र" अपनाकर भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।
जब पौधों की फलियां 70-80% पीली हो जाएं और दाने सख्त हो जाएं, तब कटाई करें।
कटाई के बाद फसल को "धूप में 3-4 दिन सुखाएं", फिर थ्रेसर या हाथ से दाने निकालें।
औसत उपज (जैविक खेती में):
10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (सही प्रबंधन से 15 क्विंटल तक)
• जैविक कीटनाशक/छिड़काव 》 ₹3,000
• मजदूरी व सिंचाई 》 ₹5,000
• कुल लागत 》 ₹25,000
• औसत आय (15×₹7,000 प्रति क्विंटल) 》₹105,000
• कुल शुद्ध लाभ 》 ₹75,000 से 80,000 प्रति हेक्टेयर।सरसों की जैविक खेती के प्रमुख लाभ:
- शुद्ध और पौष्टिक तेल का उत्पादन
- मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार
- लंबे समय तक टिकाऊ उत्पादन क्षमता
- पर्यावरण संरक्षण
- रासायनिक मुक्त उत्पादों की बाजार में अधिक कीमत
- किसानों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव
आज भारत और विदेशों में "ऑर्गेनिक मस्टर्ड ऑयल" की भारी मांग है।
सभी किसान भाई "FSSAI या NPOP प्रमाणन" लेकर अपने उत्पादों को जैविक लेबल के साथ बेच सकते हैं।
बेचने के लिए, E-commerce प्लेटफ़ॉर्म (जैसे- Amazon, Flipkart, BigBasket) पर भी अपने जैविक उत्पादों की बिक्री संभव है।
2025 में भारत में जैविक कृषि क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है।
सरकार द्वारा भी जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं जैसे-
- परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
- जैविक खेती मिशन (OFM)
धन्यवाद 🙏लेखक: सी.एल. साहनी,कृषि एवं जैविक खेती सलाहकारBy: Good Lifecl Blog
✅️यह भी पढ़िए: जैविक खेती कैसे करें।
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✔️जानिए जैविक सरसों की खेती करने की पूरी प्रक्रिया - बीज का चयन, भूमि की तैयारी, जैविक खाद, रोग नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने के उपाय। यह लेख किसानों के लिए 2025 में सरसों की जैविक खेती से अधिक मुनाफा कमाने की पूरी जानकारी देता है।

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